ढ़ली साँझ तो दरख्तों पे परिंदे, अपने-अपने आशियाने ढूढ़ रहे थे, गुज़ार कर ग़ैरों की बाहों में वो दिन सारा, शाम को बहाने ढ…
Read more »उल्फ़त का मैं इक घायल परिंदा हूँ, वफ़ा करके इक बेवफ़ा से ख़ुद से ही शर्मिंदा हूँ, अक्सर लोग जिन हालातों में मौत को गले लगा …
Read more »होकर ज़िन्दगी की उलझनों से घायल, हर परिंदा ना-शाद ही मिलेगा, जो सुकून तुम जीते जी ढूँढ़ रहे हो, वो तो मरने के बाद ही मिले…
Read more »निग़ाहों ही निग़ाहों में गुफ़्तगू हो रही है और लब ख़ामोश हैं, आरज़ू-ए-उल्फ़त में होकर बड़े बेक़रार दो परिंदें मदहोश हैं। Nigaho…
Read more »रोज़ राह तकता है इक परिंदा अपने हम-सफ़र की, जो ख़फ़ा ही नहीं, बेवफ़ा भी होकर चला गया है ..! Roz raah takta hai ik parinda ap…
Read more »मौसम-ए-बहार भी आएगा पहले पतझड़ जाने दो, परिंदे की "फ़ितरत" देखनी है तो उसे उड़ जाने दो..! Mausam-e-bahar bhi aay…
Read more »बा-अदब आज़ाद कर दिया आज हमने उस 'परिंदे' को.., जो क़ैद में हमारी होकर, ख़्वाहिश-ए-गुटरगूं ग़ैरों संग रखता था। Ba-a…
Read more »मोहब्बत का आशियाँ पल-भर में ऐसे उजड़ गया, चुपके से किसी डाल से जैसे कोई परिंदा उड़ गया। Mohabbat kaa aashiyan pal-bhar me…
Read more »ना ग़ुरूर है मुझें ना गुमान है, बस ख़ुद को इतना यक़ीन है, आसमां में भी वही परिंदे उड़ते हैं, पैरों तले जिनके ज़मीन है। Naa …
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