Mohabbat एक ऐसा एहसास है जो लफ़्ज़ों में बयां नहीं होता, पर शायरी उसे दिल तक पहुंचा देती है। My Alfaaz पर मैं Marudhar Rahi आपके लिए लाया हूँ 80+ बेहतरीन Mohabbat Shayari in Hindi और Ishq Shayari का सबसे बड़ा Collection।यहाँ आपको 2 Line And 4 Line Mohabbat Shayari, True Love Shayari, Girlfriend-Boyfriend के लिए Ishq Shayari और दिल को छू लेने वाली Sad Mohabbat Shayari मिलेगी। अगर आप भी किसी की मोहब्बत में खोए हुए हैं और अपनी फीलिंग्स को शायरी में कहना चाहते हैं, तो ये शायरियाँ सिर्फ आपके लिए हैं।
Mohabbat Shayari in Hindi by Marudhar Rahi
कभी न कभी तो वो भी हमको खोने से डरते,
ग़र वो भी हमको हमारी तरह मोहब्बत करते।
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बेशक़ नाराज़गी अब ता-उम्र तुझसे रहेगी बेवफा,
पर मोहब्बत तुझसे थी और तुझसे ही रहेगी बेवफा।
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मर्ज़-ए-मोहब्बत से हमको भी शिफ़ा मिल जाती,
ग़र वफ़ा के बदले हमको भी 'वफ़ा' मिल जाती..!
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ना उसकी कोई ख़ता थी, ना ही मेरा कोई कसूर था,
मोहब्बत में 'दर्द' मिलना, मोहब्बत का ही दस्तूर था।
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ख़ता ख़ुद की ही थी, तो फ़िर अब गिला क्या है,
मोहब्बत में किसी को, दर्द के सिवा मिला क्या है।
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ये मर्ज़-ए-मोहब्बत मेरे यार, कुछ ऐसा ही होता है,
वरना यूँ रातों में उठकर, कौन कमबख़्त किसको रोता है।
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हमको हमारी ही मोहब्बत के उस अंजाम पे रोना आया,
हम तो हो गए थे उनके, क्यों उन्हें हमारा न होना आया।
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उनसे मोहब्बत है हमको, लगता है ग़ालिबन उन्हें इतना ख़याल ही नहीं,
हम तो ख़फ़ा हैं उनकी बेवफ़ाई से, नफ़रत का तो कोई सवाल ही नहीं।
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हसरत ही नहीं ये आरज़ू भी थी कि, मोहब्बत में हम हद से गुज़र जाएंगे,
अफ़सोस... कभी सोचा न था, बेवफ़ाई लिखते-लिखते हम मर जाएंगे।
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'ऐ ख़ुदा'.. तू मेरी पाक मोहब्बत का फ़क़त इतना तो सिला दिया कर,
जिसको मुक़द्दर में न लिखा मेरे, उसको ख़्वाबों में ही मिला दिया कर।
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मुसलसल मिल रही हैं हमें, मोहब्बत में वफ़ा के बदले बेवफ़ाइयाँ,
शायद ख़ुदा ने मुक़र्रर कर दी है, नसीब में मेरे जुदाई और तन्हाइयाँ।
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ना उसने कभी मेरे हालातों की फ़िक्र की, ना जज़्बातों की क़द्र की,
हमने फ़क़त उनसे मोहब्बत की, जो बे-इंतिहा बे-हिसाब बे-सब्र की।
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कहते हैं सच्ची मोहब्बत की दास्ताँ, कभी मुकम्मल नहीं हुआ करती,
अब तेरी बेवफ़ाई पर हम मातम करें, या अपनी वफ़ा का दावा करें।
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पलकों पे बिठाकर सीने से लगाकर, दिल से तेरी हम इबादत करते,
काश... कि कभी तो तुम यार, हमसे हमारी तरह 'मोहब्बत' करते।
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दूर तलक जो दिखता है फ़लक, उसी को लोग आसमान कहते हैं,
दुनिया जिसे मोहब्बत कहती है, हम उसे मौत का सामान कहते हैं।
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मुझे कहाँ पता था मेरे यार कि, मर्ज़-ए-मोहब्बत कैसा होता है,
मोहब्बत की तो पता चला, इसमें आँखों से ज़्यादा 'दिल' रोता है।
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वाह रे मेरे ख़ुदा, मुझ बद-नसीब पर भी क्या ख़ूब इनायत की है,
किस्मत में तन्हाई लिखकर, दिल में बे-इंतिहा मोहब्बत दी है..!!
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मोहब्बत का सारा ख़ुमार, पल-भर में चकना चूर हो गया,
जिसको चाहा था जां से ज़्यादा, वही जब हमसे दूर हो गया।
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मोहब्बत करने वाले आशिक़, अंज़ाम की फ़िक्र कहाँ किया करते हैं,
जो औरों के लिए जीते हैं, वो फिर अपना ज़िक्र कहाँ किया करते हैं।
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काश... तेरे जैसी मोहब्बत मैंने बेवफ़ा, पहले किताबों से की होती,
तो यक़ीनन दिल की मुक़म्मल गलियां आज, गुलाबों से सजी होती।
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तक़दीर बनकर आया था वो, और किस्मत भी छीनकर ले गया,
मोहब्बत का 'खेल' खेलकर हमसे, बद-नसीबी का ग़म दे गया।
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फ़क़त इतना ही फ़र्क था हम दोनों की, चाहत और मोहब्बत में,
वो वक़्त मिलने पर बात करते थे, और हम वक़्त निकाल कर..!
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रो पड़ा वो दरख़्त भी फिर, दास्तां-ए-मोहब्बत मेरी सुनकर,
कसमे-वफ़ा उस बेवफ़ा ने, खाई थी कभी जिससे लिपटकर।
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हार कर मोहब्बत की बाज़ी, फिर ख़ुद को कैसे सम्भालते हैं,
कोई बतलाए हमें, बेवफ़ा यार को दिल से कैसे निकालते हैं।
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क्यूं लिखी ख़ुदा तूने, मोहब्बत करने वालों की ऐसी तक़दीर,
मजनू-मजनू करते लैला मर गई, राँझा-राँझा करते हीर,
मुझ अभागे आशिक़ को, मौत भी मयस्सर न हुई उल्फ़त में,
दर-ब-दर भटक रहा हूँ, बनकर इश्क़ का जोगी और फ़क़ीर।
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उल्फ़त में हमने अपनी दिल-ओ-जां जिस पर वार दी,
अफ़सोस उसी ज़ालिम ने मोहब्बत हमारी दुत्कार दी।
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बेकसी बेबसी क्या होती है, ये उनसे पूछना मेरे 'दोस्त',
जिसने मोहब्बत तो शिद्दत से की, पर मुक़म्मल न हुई।
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मोहब्बत तो हमने भी यार, बे-इंतिहा बे-हिसाब की थी,
अफ़सोस... कि, हमारी महबूबा ही दग़ा-बाज़ निकली।
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ख़ुद को ख़ुश-नसीब, और ख़ुश-किस्मत समझता था मैं,
जब तलक उस बेवफ़ा को अपनी, मोहब्बत समझता था मैं।
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बड़ी तलब लगी है आज, सिसक-सिसककर रोने की..,
तुम कोई गुज़रा हुआ, अफ़साना-ए-मोहब्बत ही सुना दो।
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ख़ुदा खैर करे, बेचारे बद-नसीब मोहब्बत के मारों की,
वो कौड़ियों में बिक गए, जिन्हें ख़्वाहिश थी हज़ारों की।
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अब क्या ही 'ज़िक्र' करे उस बेवफ़ा की बेवफ़ाई का,
दिल भर गया मोहब्बत से मेरी बस उस हरजाई का।
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नाम-ए-मोहब्बत कोई हमको ऐसी सज़ा दे गया,
उल्फ़त का हवाला देकर जीते-जी क़ज़ा दे गया।
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मोहब्बत को न तोल तू बेवफ़ा, यूँ दौलत के तराजू में,
महलों में भी 'इश्क़' रोते देखा है, हमने हमारे बाजू में।
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करके मोहब्बत हम, मोहब्बत के गुनेहगार हो गए,
इक हरजाई के प्यार में, रुसवा सरे-बाज़ार हो गए।
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ग़र होता कोई नग़मा, तो वक़्त बे-वक़्त गुनगुनाते हम,
ग़र होती तू कोई दास्तां, तो हर किसी को सुनाते हम,
तू पहली और आख़िरी, मोहब्बत थी मेरी बेवफ़ा..,
तुझसे ही 'दिल' न लगाते, तो फ़िर कहाँ जाते हम।
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करके इक बेवफ़ा से 'दिल्लगी' हमने,
खामखाँ मोहब्बत से अदावत करली।
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हमें तो इक बेवफ़ा की 'सादगी' ने छला है,
वरना ये उल्फ़त और मोहब्बत क्या बला है।
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तुझको हक़ था मेरी जान, हर तोहमत का,
इकलौता हक़दार था तू, मेरी मोहब्बत का।
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तू तोहमत न लगा मेरी मोहब्बत पे बे-मुरव्वत,
मैंने चाहा है तुझे, ख़ुदा की इबादत समझ कर।
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तुझसे मोहब्बत करने की, नीयत हमारी नेक थी,
हम रोए तेरे लिए, चाहत जो हमारी 'तू' एक थी।
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मोहब्बत का आशियां, पल-भर में ऐसे उजड़ गया,
चुपके से किसी डाल से, जैसे कोई परिंदा उड़ गया।
वो हमसे जुदा होकर ग़ैरों पे फ़िदा होते हैं,
क्या वाक़ई मोहब्बत के ऐसे ख़ुदा होते हैं।
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बनाकर हमको अपनी मोहब्बत का ख़ुदा,
'इबादत' वो किसी और की करने लगे..!
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जलाकर शमा दिल में मेरे वो मोहब्बत की,
करने लगे आरज़ू रक़ीबों संग सोहबत की।
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जलकर चराग़ मोहब्बत के बुझ भी गए,
ना दिल से धुआं उठा ना हम राख़ हुए..!
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मोहब्बत ही जब सितमगर हो जाती है,
ज़िन्दगी मौत से भी बदत्तर हो जाती है।
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ता-उम्र 'जवा' रहती है वो मोहब्बत..,
जो जिस्म से नहीं, रूह से हुआ करती है।
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मोहब्बत ही है वो 'मीठा' ज़हर और रोग..,
जिसमें मर-मरकर जीने को बेताब हैं लोग।
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काश... मोहब्बत में भी इक ऐसा रिवाज होता,
बेवा की तरह बेवफ़ा का, अलग लिबास होता।
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मोहब्बत में कोई इतना भी मदहोश ना रहे,
के ज़िन्दगी मुजरा करती रहे, और होश ना रहे।
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जबसे मोहब्बत की बाज़ी हम हार बैठे हैं,
यक़ीन मानो बेवज़ह बेसबब बेकार बैठे हैं।
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कौन कमबख़्त अपनी मौत चाहता है,
मरीज़-ए-मोहब्बत है, दवा चाहता है।
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मोहब्बत में मंज़िल उन्हीं को मिली,
जिन्होंने कभी सीधी 'राह' ना चली।
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जब जज़्बातों ने ही दम तोड़ दिया,
हमने मोहब्बत करना ही छोड़ दिया।
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जब किस्मत अपनी ख़फ़ा हो गई,
तो मोहब्बत अपनी बेवफ़ा हो गई।
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मोहब्बत से जहाँ दिल भर जाते हैं,
अक्सर बहाने वहाँ घर कर जाते हैं।
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मोहब्बत में अक्सर बातें लम्बी,
और रातें छोटी हुआ करती है..!
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अधूरी मोहब्बत..,
तबाह मुक़म्मल करती है।
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दिल में भाव भी होना चाहिए, फ़क़त सिर का झुकाना ही इबादत नहीं..,
थोड़ी जज़्बातों की समझ भी होनी चाहिए, दिल का लगाना ही मोहब्बत नहीं।
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मिली है जबसे मोहब्बत में हमको बेवफ़ाई, दिल पे इक क़यामत सी हो गई है,
कोई ज़हमत न करे हमको दर्द देने की, हमको दर्द सहने की आदत सी हो गई है।
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वो 'खून' के आँसू थे मेरे, जिसे लोगों ने यार महज़ मेरी आँखों का बहता पानी समझा,
अफ़सोस... मेरी मोहब्बत और जवानी को, हर किसी ने मेरी नासमझ नादानी समझा।
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मोहब्बत तो दिखाई नहीं तुमने कभी हमें, हम पे बिगड़ने के लिए ही आ जाओ,
इक अरसा हो गया है तुमसे मिले-बिछड़े, फिर से बिछड़ने के लिए ही आ जाओ।
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मेरी मोहब्बत और तेरी अदावत भरी शायरियों की, दुनिया दीवानी हो रही है,
हम दिन-ब-दिन मशहूर, और कमबख़्त लम्हा-लम्हा ख़त्म जवानी हो रही है।
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मोहब्बत की हर शिद्दत से आँखों ने मेरी, कभी किसी को अपना बनाया था,
बाद-ए-बेवफ़ाई एहसास हुआ, फ़क़त वो मेरी बर्बादियों का इक साया था।
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ये न सोचना मेरे यार, कि हम भी तेरी तरह मोहब्बत दोबारा कर लेंगे,
हम तो फ़क़त तेरी तस्वीर, और तेरी यादों से ही अपना गुज़ारा कर लेंगे।
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बेशक़ जिस पर मैं फिदा था,
उसी की ख़ुशी के लिए उससे जुदा था,
मेरी पाक मोहब्बत का गवाह..,
इक मेरा दिल और दूसरा फ़क़त ख़ुदा था।
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एक से ही नहीं तुम हज़ारों से पूछो,
चाँद से ही नहीं तुम सितारों से पूछो,
हसरत-ए-मोहब्बत क्या है अंजाम..,
जाकर आशिक़ों की मज़ारों से पूछो।
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बे-मौसम शाख़ों से पत्ते गिर जाएंगे,
वादों से अपने जब वो मुकर जाएंगे,
देखना हमें मोहब्बत में 'मरुधर राही',
कमबख़्त हम बे-मौत ही मर जाएंगे।
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टूटा नहीं था मैं तोड़ा गया हूँ मैं,
मोहब्बत करके छोड़ा गया हूँ मैं,
मुक़म्मल टूटने से पहले कई मर्तबा,
खिलौनो की भांति जोड़ा गया हूँ मैं।
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बड़ा 'शौक़' था कमबख़्त मोहब्बत का हमको..,
आज उसी शौक़ के शोक में बड़े शोक से बैठे हैं।
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- - मरुधर राही ✍️










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